देहरादून(अरुण शर्मा)। उत्तराखंड में बीजेपी सरकार को साढ़े तीन साल से भी अधिक का समय हो गया है।

इन साढ़े तीन सालों में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत को हमेशा जनता का साथ मिलता रहा है।

इसकी बानगी इस दौरान हुए सभी चीते बड़े चुनावो के परिणाम है।

जिसमे न केवल इस बात को साबित किया कि उत्तराखंड की जनता त्रिवेंद्र रावत के साथ है ।अपितु पूरे दम खम के साथ है।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र की ईमानदार छवि, कड़क मिजाज और पारदर्शी राजकाज को देखते हुए भाजपा का हाईकमान उनके साथ मजबूती से खड़ा है।

प्रदेश में विकास और जनकल्याण की विचारधारा पर त्रिवेंद्र सिंह रावत राजकाज चला रहे है।

प्रदेश में भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश है। नौकरशाही के पेंच कसे हुए हैं और कानून व्यवस्था पटरी पर है।

पिछले साढ़े तीन वर्ष में जनता को त्रिवेंद्र रावत के नेतृत्व को परखने के पांच मौके मिले।

जिसमे त्रिवेंद्र रावत न केवल पास हुए अपितु अव्वल दर्जे से उत्तराखंड की जनता ने उन्हें पास किया।

बावजूद इसके विरोधी गुट त्रिवेंद्र के खिलाफ साजिशों का तानाबाना बुनता रहा और हर बार उसे मुँह की खानी पड़ी।

कसौटी पर खरे उतरते त्रिवेंद्र रावत…..

18 मार्च 2017 को त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने मुख्यमंत्री का पदभार संभाला।

इसके लगभग एक साल बाद फरवरी 2018 में थराली के भाजपा विधायक गोविन्द लाल शाह का आकस्मिक निधन हो गया।

रिक्त सीट पर उपचुनाव हुए तो तकरीबन सभी विरोधी दलों ने एकजुट होकर त्रिवेंद्र के शासन को चुनाव में चुनौती दी।

दिलचस्प मुकाबले में बाजी भाजपा के हाथ लगी।

नवम्बर 2018 में प्रदेश में नगर निकाय चुनाव का ऐलान हो गया।

विकास और सुशासन के मुद्दे को लेकर भाजपा चुनावी मैदान में उतरी।

जनता ने एकतरफा समर्थन देते हुए भाजपा को बड़ी जीत दिलवाई।

चार महीने बाद ही देश में लोकसभा चुनाव की घोषणा हो गई।

अप्रैल 2019 में लोकसभा चुनाव में उत्तराखंड में सभी 5 सीटें बीजेपी के खाते में गईं।

कैबिनेट मंत्री प्रदेश पंत का निधन होने से जून 2019 में पिथौरागढ़ विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुआ।

भाजपा को इसमें रिकॉर्ड जीत हासिल हुई। फिर आम पंचायत चुनाव का बिगुल बज गया।

मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की अगुवाई में पंचायत चुनाव में भी बीजेपी ने अपना परचम लहराया।

उत्तराखंड की जनता ने बार-बार त्रिवेंद्र सरकार पर भरोसा जताया।

लेकिन जन फैसले के उलट साढ़े तीन साल की इस अवधि में त्रिवेंद्र के खिलाफ षड्यंत्र भी खूब हुए।

उनकी कुर्सी हिलाने को अपने कुछ लोग ‘विभीषण’ हो गए।

एकजुट हुए विरोधियों की बैठकों के कई दौर चले। सिर से सिर मिलकर साजिशें रची गईं।

मुख्यमंत्री बदलने को हर फंडा अपनाया गया। त्रिवेंद्र के खिलाफ ठोस मुद्दे की तलाश की गई, पर ढूंढने से भी विरोधियों को कोई मुद्दा नहीं मिला।

 

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