हरिद्वार (विकास चौहान)। पुराणों में माँ गँगा (Ganga) को मोक्षदायिनी और प्राणदायिनी कहा जाता है। साल भर माँ गँगा (Ganga) अपने भक्तों का भरण पोषण करती है। हरिद्वार में दशहरे वाले दिन साफ सफाई के लिए यूपी सिंचाई विभाग द्वारा गँगा (Ganga) के पानी को दीवाली तक रोक दिया गया है लेकिन सूखने के बाद ही हरिद्वार के हजारों लोगों की दीवाली मनती है, सुखी गँगा (Ganga) में लोग कुछ न कुछ चुगते और बीनते नजर आते है। लेकिन जरूरी नही ये लोग गरीब हो या पैसों के लिए ये काम कर रहे है।
जहाँ एक और हरिद्वार के व्यापारी वार्षिक गँगा बंदी से परेशान होते है वही दूसरी और कुछ लोगो को गँगा बंदी का बेसब्री से इंतजार रहता है। ये लोग गँगा में सिक्के, सोना चांदी जैसी धातुओ को चुगते है और उसे बेचकर अपनी आजीविका चलाते है। कभी कभी तो इन लोगो को हीरे जवारत के रूप में इतना कुछ मिल जाता है कि साल भर की पूर्ति ये लोग गँगा बंदी के दौरान कर लेते है।
लेकिन जरूरी नही है कि जो लोग गँगा से कुछ बीन रहे है वो पैसों के लिए ये सब कर रहे है। गँगा में कुछ न कुछ बीन रहे ये तीन प्रकार के लोग है। इसके पीछे पौराणिक मान्यता भी है। हरिद्वार गँगा सभा के कोषाध्यक्ष यतीन्द्र सीखौला बताते है कि इन तीन श्रेणियों में सबसे पहली श्रेणी में वो लोग है जो गँगा से सिक्के सोना चांदी या अन्य धातुओ को बीनकर अपनी आजीविका चलाते है। दूसरी श्रेणी में आम आदमी की रूप में वो श्रद्धालु है जो वास्तव में सेवा भाव से गँगा की सफाई करने का काम करते है। ये लोग गँगा में कपड़े, प्लास्टिक या अन्य गंदगी को साफ करके भी माँ का आशीर्वाद प्राप्त करते है। तीसरी श्रेणी में वो लोग है जो गँगा से सिक्के उठाते तो है लेकिन पैसों के लिए नही। बल्कि ये वो लोग होते है जिनकी कोई संतान प्राप्ति नही होती। संतान प्राप्ति के लिए ये लोग गँगा से सिक्का उठाकर अपने पास उस सिक्के को गँगा पुत्र के रूप में रख लेते है और माँ गंगा से संतान प्राप्ति की कामना करते है। जब इन लोगो की मनोकामना पूर्ण हो जाती है तब ये लोग उस सिक्के के बदले में सोने या चांदी से बना सिक्का फिर से गँगा में चढ़ा देते है।
तो ये वो मान्यता है जिससे लोगो का वो भ्रम दूर हो जाता है कि गँगा बंदी में कूड़ा बीनने वाले लोग ही नजर आते है। कल कल बहकर भक्तों का कल्याण करने वाली माँ गँगा सूखने के बाद भी कुछ लोगो की आस्था व कुछ की आजीविका का कारण बनी हुई है।

 

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