त्रिवेंद्र सरकार की विकास की बयार तो देखों,बाथरुम में जच्चा-बच्चा तोड़ रहे दम

त्रिवेंद्र सरकार की विकास की बयार तो देखों,बाथरुम में जच्चा-बच्चा तोड़ रहे दम

देहरादून(अरुण शर्मा)। त्रिवेंद्र सरकार की विकास की बयार तो देखों प्रसूता बाथरुम में जन रहे बच्चें। जी हां यह हकीकत उत्तराखंड के किसी पहाड़ी क्षेत्र की नहीं अपितु सूबे की राजधानी देहरादून की हैं। जंहा मेडिकल की लाइफ लाइन कही जाने वाले दून महिला अस्पताल में ऐसा मामला सामने आया जिसने सभी को न सिर्फ चौंका दिया अपितु सोचने पर मजबूर कर दिया। बाथरुम में जन्मे बच्चे की मौत के बाद ​सिस्टम का नाकारापन और लापरवाही की इंतहा का यह आलम प्रदेश में जच्चा-बच्चा की जिंदगी का कोई मोल नहीं है यही बताने को काफी हैं।

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राजधानी देहरादून में चिकित्सा की लाइफ लाइन कहे जाने वाले दून महिला अस्पताल में टिहरी निवासी महिला ने शौचालय में बच्चे को जन्म दिया। लापवरावाही का आलम तो तब सामने आया जब बच्चें के शौचालय में पैदा होने के बाद भी उसे कोई मदद नहीं मिली। शायद यही वजह है कि शौचालय में जन्मे बच्चें ने जन्म के कुछ घंटे बाद दम तोड़ दिया। दरअसल टिहरी के रहने वाले बृजमोहन बिष्ट ने अपनी आठ माह की गर्भवती पत्नी आरती को दून महिला अस्पताल में भर्ती कराया था। सुबह जब शौच के लिए वह गयी तो शौचालय में पानी नहीं था। जिससे वह दूसरे शौचालय में गयी तो वहां प्रसव पिड़ा के बाद उसने बच्चें को वहीं जन्म दे दिया। बृजमोहन के अनुसार उसने स्टाफ को मदद के लिए बुलाया लेकिन कोई नहीं आया जिसके बाद जच्चा—बच्चा को अस्पताल में भर्ती कर इलाज किया गया लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी थी और बच्चे की इलाज के दौरान मौत हो गयी।

पहले भी हो चुकी इस तरह की घटनायें

दून महिला अस्पताल में लापरवाही का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले 20 सितंबर को अस्पताल में इस तरह की घटना घट चुकी है। जिसमें फर्श पर ही प्रसूता ने बच्चे को जन्म दिया और जच्चा—बच्चा ने दम तोड़ दिया। उस समय उच्च अधिकारीयों ने भी निरीक्षण कर व्यवस्थाओं में सुधार का दावा किया था लेकिन ताजा घटना ने न केवल अधिकारीयों के दावों की पोल खोल दी अपितु त्रिवेंद्र सरकार की स्वास्थ्य को लेकर गंभीरता को भी उजागर कर दिया हैं।

बिमार अस्पताल से कैसी आस ?

महिला अस्पताल पर देहरादून जनपद के अलावा पहाड़ के दूरस्थ क्षेत्रों और यूपी-हिमाचल के सीमावर्ती इलाकों से भी मरीज आ रहे हैं। अस्पताल में एक साल में औसतन ओपीडी 93606, भर्ती मरीज 23648, डिलीवरी 8865 और ऑपरेशन 11639 होते हैं। यहां केवल सात डॉक्टर और 21 स्टॉफ नर्स हैं। एमसीआइ के मानकों के मुताबिक 60 बेड यहां लगाए जा सकते हैं, लेकिन 132 बेड लगाए गए हैं।

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