महिला दिवस के उत्सव पर महिला की इस बेबाक राय से आप भी ​करेगें इत्तेफाक

महिला दिवस के उत्सव पर महिला की इस बेबाक राय से आप भी ​करेगें इत्तेफाक

लेखिका डॉ पूर्णिमा पाराशर एजुकेटर्स कॉउन्सिल ऑफ इंडिया की सदस्य है

महिला दिवस पर बेबाक राय……….

आज सुबह से ही लगभग सभी न्यूज़ चैनल्स में नारी महान जैसी तस्वीरे सामने आ रही थी सोशल मीडिया तो और भी दो कदम आगे चल रहा था क्या व्हाट्सएप क्या फेसबुक सब जगह नारी ही नारी। कहीं पर नारी को मां के रूप में पूजा जा रहा था तो कहीं पत्नी और बहन के रूप में तो कहीं माता वसुधा को भी नारी के रूप में प्रदर्शित किया जा रहा था सभी कुछ तो मानो सही चल रहा था.

लेकिन जैसे ही आज का समाचार पत्र खोला प्रथम पृष्ठ से लेकर लगभग 5वें पृष्ठ तक सभी जगह पर नारी का गुणगान करते लोग नहीं थक रहे थे और जैसे ही मैं 6ठे पृष्ठ पर पहुँचा तो दाएं हाथ की तरफ एक कोने में खबर छपी थी एक नवजात बच्ची कूड़े के ढेर में पाई गई बस यही आकर माथा ठनका और समाज का हैप्पी वूमेन्स डे का ढकोसला समझ आने लगा ।

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एक तरफ तो हम नारियों को बराबर का दर्जा देने की बात करते है वही दूसरी तरफ एक नारी लावारिस कूड़े के ढ़ेर में पड़ी होती है ऐसा दोगलापन आखिर क्यो और कब तक घ् इन सब से एक बात समझ आती की जब तक हम लैंगिक समानता को नही पा लेते टैब तक हैप्पी वूमेन्स डे मनाना बेमानी ही है। लैंगिक समानता लाने के लिए भारत में महिला सशक्तिकरण बहुत आवश्यक है या फिर हम ये कह सकते हैं कि लैंगिक समानता महिला सशक्तिकरण के लिए बहुत आवश्यक है।

हमारा देश अभी भी एक विकासशील राज्य है और देश की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब है क्योंकि ये पुरुष प्रधान राज्य है। पुरुष ;अर्थात् देश की आधी शक्तिद्ध अकेले घूमते हैं और वो महिलाओं को केवल घर के कामों को करने के लिए मजबूर करते हैं। वो ये नहीं जानते कि महिलाएं भी इस देश की आधी शक्ति है और पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने से देश की पूरी शक्ति बन सकती है। एक दिन जब देश की पूरी शक्ति काम करना शुरु कर देगीए तो कोई भी अन्य देश भारत से अधिक शक्तिशाली नहीं होगा। पुरुष ये नहीं जानते कि भारतीय महिलाएं कितनी शक्तिशाली हैं।

ये सभी भारतीय पुरुषों के लिए बहुत आवश्यक है कि वो महिलाओं की शक्ति को समझे और उन्हें स्वंय को आत्मनिर्भर और देश व परिवार की शक्ति बनाने के लिए आगे बढ़ने दें। भारत में महिला सशक्तिकरण लाने के लिए लैंगिक समानता पहला कदम है। पुरुषों को ये नहीं सोचना चाहिए कि महिलाएं केवल घर व परिवार के कामकाज को करने या लेने के लिए जिम्मेदार है। पुरुषों को भी घरए परिवार और अन्य उन कामों को करने के लिए भी जो महिलाएं करती हैंए अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए ताकि महिलाओं को खुद के और अपने कैरियर के बारे में सोचने के लिए कुछ समय मिल सके।

महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए बहुत से कानून है हालांकिए कोई भी बहुत अधिक प्रभावशाली नहीं है और न ही लोगों के द्वारा उनका पालन किया जाता है। यहाँ कुछ प्रभावशाली और कड़े नियम होने चाहिए जिनका सभी के द्वारा अनुसरण किया जाये। ये केवल हमारी सरकार की ही जिम्मेदारी नहीं हैए ये प्रत्येक और सभी भारतीयों की जिम्मेदारी है। प्रत्येक भारतीय को महिलाओं के प्रति अपनी सोच बदलने और महिला सशक्तिकरण के लिए बनाये गए नियमों का कड़ाई से पालन करने की आवश्यकता है।

केवल नियम कुछ नहीं कर सकतेए बल्कि नियमों के विषयों को समझने की भी आवश्यकता है किए नियम क्यों बनाये गए हैंए हमारे देश के लिए महिला सशक्तिकरण क्यों आवश्यक है और अन्य सवालों को भी समझने की आवश्यकता है। इन पर सकारात्मक रुप से सोचने की जरुरत हैए महिलाओं के बारे में अपनी सोच को बदलना जरुरी है। महिलाओं को पूरी स्वतंत्रता देने की आवश्यकता हैए ये उनका जन्मसिद्ध अधिकार है।

महिलाओं को भी अपनी पूर्वधारणाओं को बदलने की जरुरत है कि वो कमजोर हैं और कोई भी उन्हें धोखा दे सकता है या उनका प्रयोग कर सकता है। इसके बजाय उन्हें ये सोचने की केको बढ़ावा देनेए महिलाओं के स्वास्थ्य के बारे में जागरूकता में सुधार लाने और जीवन में अपनी स्वतंत्रता का विस्तार करने के लिए बहुत से निजी और सरकारी संगठन और संस्थाएं हैए इतने तामझाम और मानव अधिकारों के बावजूदए महिलाएं अभी भी आश्रितए गरीबए अस्वस्थ्य और अशिक्षित हैं। हमें इसके पीछे के कारणों के बारे में सोचकर और तत्काल आधार पर सभी को हल करने की जरूरत है ताकि हमारा हैप्पी वूमेन्स डे सच मे ही हैप्पी हो सके।

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