इंदिरा-राजीव को मौत देने वाला रहस्यमयी अस्पताल—सांकेतिक चित्र,आभार
 

काशीपुर(अरुण शर्मा)। इंदिरा-गांधी और राजीव गांधी ने इस अस्पताल का शुभारंभ करने की सोची तो उन्हे भी अनहोनी से गुजरना पड़ा। जी हां यह हकीकत है या फिर फसाना कोई नहीं जानता लेकिन लोगों का कहना यही हैं। हम बात कर रहे हैं। उत्तराखंड के एक ऐसे अस्पताल की जिसे जीवन देने वाला नहीं अपितु डरावने अहसास के साथ मौत देने वाला माना जाता हैं। काशीपुर का सीतापुर के इस आंखों के अस्पताल में क्या है हकीकत और क्या है फसाना जानने के साथ पता करते है कि आखिर क्यों और वो कौन सा रहस्य है, जो उद्धघाटन से पहले ही लील लेता है उद्धघाटन करने वाले कि जिंदगी

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रात को घुंघरु की आवाज से गूंजता है ये अस्पताल, और कमरों से आती है डरावनी आवाज, यहाँ रात को रुकना मतलब मौत को दावत देने जैसा है, काशीपुर का सीतापुर आंखों का अस्पताल एक रहस्य बना हुआ है, जंहा कहते ही 1982 में इस अस्पताल के बनने के बाद इसका उद्धघाटन तक नही हो पाया और जिसने भी इस अस्पताल के उदघाटन की सोची और जिझक भी नाम उद्धघाटन से जुड़ा वो किसी न किसी हादसे का शिकार हो गया, जिसमे कई बड़े नाम भी शामिल है, स्थानीय निवासी राजीव की माने तो देश की पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी, स्वर्गीय राजीव गांधी जैसे कई बड़े नाम ऐसे है जिनका इस अस्पताल के उदघाटन से नाम जुड़ने के बाद ही उनके साथ हादसे हो गए, कहते है इस अस्पताल की नींव रखने वाले भी एक सड़क हादसे में अकाल की मैत के मुँह में समा गए, इस आत्माओं के साये और ख़ौफ़ का पर्याय बने इस अस्पताल में आज तक न कोई डॉक्टर ही रुक पाया और ना ही ये अस्पताल कभी संचालित ही हो सका।

इस अस्पताल में चौकीदार करने वाले किशोरी लाल कहते है कि काशीपुर के इस अस्पताल में आत्माओं का साया मंडराता है, और जो कोई भी रात के समय यंहा रहता है उसे डरावनी आवाजें सुनाई देती है, भले ही अस्पताल के अंदर कभी कोई घटना नही घाटी हो मगर डरावनी आवाजो से इस क्षेत्र के लोग अंजन भी नही है, जंहा इसके उद्धघाटन को लेकर मिथक बना है कि उद्धघाटन करने वाला कभी जिंदा ही नही बचा वही इस अस्पलात का जीर्णोद्धार करने की भी कई बार कोशिश की गई मगर नतीजे सिफर ही रहे। और आज भी ये भवन ख़ौफ़ के खंडर के रूप में खड़ा है जंहा दिन के समय भी लोग जाने से कतराते है।

 

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