मंथन-लड़कियों को लेकर समाज के विरोधाभासी सोच का कैसे हो अंत ?

मंथन-लड़कियों को लेकर समाज के विरोधाभासी सोच का कैसे हो अंत ?

हरिद्वार। साउथ अमेरिका की टैक्सीला यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर डॉ मेहनाज नाज़मी ने कहा कि समाज में कहा जाता है कि हम अपनी लड़की को लड़के की तरह प्यार करते हैं।

इसमें ही विरोधाभास साफ झलकता है। लड़की को लड़के की तरह प्यार क्यों किया जाता है।

लड़की को लड़की की तरह प्यार क्यों नहीं किया जाता। इसका मतलब है कि हम कहीं ना कहीं भेदभाव कर रहे होते हैं।

डॉ नाजमी चमन लाल महाविद्यालय लंढौरा और राजकीय डिग्री कॉलेज घाट चमोली की ओर से महिला सशक्तिकरण विषय पर आयोजित अंतरराष्ट्रीय वेबीनार को संबोधित कर रही थी।

कार्यक्रम का शुभारंभ चमनलाल महाविद्यालय की उप प्राचार्य डॉक्टर दीपा अग्रवाल ने अतिथियों के परिचय के साथ किया।

डॉ नाजमी ने कहा कि महिला को घर से बाहर निकलते हुए डराया जाता है। लड़की और लड़के के बीच भेदभाव की जो प्रक्रिया घर से शुरू होती है वह उसके ऑफिस तक भी चलती है।

जब भी ऑफिस में उसे प्रमोशन मिलता है तो उसे अलग ही निगाह से देखा जाता है। लड़की को कह दिया जाता है कि वह बॉस के बहुत करीब है।

यहां पर करीब शब्द का अर्थ बहुत ही गलत होता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनेक कानून बनाए गए हैं।

लेकिन हमें उन कानूनों का इस्तेमाल ही नहीं करने दिया जाता। सेक्सुअल हैरेसमेंट को लेकर जब भी महिला कानून का सहारा लेना चाहती है तो घर के अंदर से ही उसे रोक दिया जाता है।

उच्च शिक्षा की पूर्व निदेशक डॉ सविता मोहन ने कहा कि देश में महिलाओं की समस्या के समाधान के लिए जितने भी संगठन बने हैं उनका नेतृत्व पुरुषों की ओर से किया जा रहा है।

इसका परिणाम यह होता है कि इनमें धीरे-धीरे राजनीतिक दखल होने लगता है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के मीरांडा हाउस कॉलेज की प्राचार्य डॉ बिजया लक्ष्मी नन्दा ने कहा कि हमारे यहां नारा दिया जाता है कि महिला और पुरुष दोनों बराबर हैं।

जब घरेलू कार्य की बात बारी आती है तो वह केवल महिलाओं के हिस्से में आता है। अगर महिला और पुरुष बराबर है तो घर के काम में भी पुरुषों को बराबर की हिस्सेदारी निभानी चाहिए।

इस पर भी पुरुषों को एक समझ विकसित करनी होगी। महिला और पुरुष का अंतर समाप्त करना है तो सबसे पहले इसे अपने परिवार से शुरू करना होगा।

लड़का और लड़की का अंतर खत्म करने के लिए इसे अपने घर से ही शुरू करें। घर में सभी बच्चों को समान प्यार दें।
-दिल्ली विश्वविद्यालय के कालिंदी कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ अनीता टैगोर ने कहा कि घरेलू हिंसा के लिए कई हेल्पलाइन बनाई गई हैं।

घरेलू हिंसा का मतलब केवल शारीरिक क्षति पहुंचाना नहीं है। अगर किसी तरह का तंज कसा जा रहा है तो वह भी घरेलू हिंसा के दायरे में आता है।

अगर पति या परिवार के अन्य सदस्य बच्चों की फीस जमा नहीं करते हैं तो वह भी घरेलू हिंसा कहा जाएगा।

कोरोना महामारी के इस काल में बहुत सारे पुरुषों को यह पता चल गया होगा कि महिलाएं घर में किस तरह काम करती हैं।

महिलाओं के काम को हल्के में ले जाता था लेकिन इस दौरान पुरुषों को ज्ञात हुआ होगा कि महिलाएं घर और घर से बाहर किस तरह से कठिन परिस्थितियों में काम करती है और बच्चों की जिम्मेदारी को भी बखूबी निभाती हैं।

चमन लाल महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सुशील उपाध्याय ने कहा कि महामारी के काल में अनेक लोग बेरोजगार हुए हैं। ऐसी स्थिति में भी महिलाओं के ऊपर विशेष जिम्मेदारी आ गई है।

भले ही घर के पुरुष सदस्य की नौकरी गई हो लेकिन घर में रोजी रोटी और बच्चों की देखभाल को लेकर सबसे ज्यादा चुनौतियां महिलाओं के सामने आई हैं।

बड़ा सवाल यह है कि क्या ऐसी विपरीत स्थिति में भी महिलाएं खुद को सशक्त रखकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन पूर्व की भांति कर सकेंगी।

प्रबंध समिति के अध्यक्ष डॉ रामकुमार शर्मा, सचिव अरुण हरित और कोषाध्यक्ष अतुल हरित ने वेबीनार की सफलता के लिए आयोजकों को बधाई दी।

वेबीनार का संचालन आयोजन सचिव डॉ.दीपा अग्रवाल ने किया। राजकीय डिग्री कॉलेज घाट चमोली की असिस्टेंट प्रोफेसर एवं कार्यक्रम संयोजक डॉ मोमिता शर्मा ने प्रतिभागियों का आभार जताया।

वेबीनार में तकनीकी विशेषज्ञ विपिन चौधरी और शुभम धीमान ने विशेष सहयोग दिया।
वेबीनार में राजकीय डिग्री कॉलेज घाट के प्राचार्य डॉ के एन बरमोला, डॉ. राखी उपाध्याय, डॉ मुकेश गुप्ता, ललित मिगला कोनी, डॉ सुभाष अग्रवाल,डॉ सूर्यकांत शर्मा, डॉ अपर्णा शर्मा, डॉ नवीन त्यागी,हरीश गुरुरानी आदि ने भी प्रतिभाग किया।

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